भगवान शिव जिन्हें अनेक नामों से पुकारा जाता है, उनमे से एक “नीलकंठ” भी हैं। महादेव के सभी नामों के पीछे का विशेष अर्थ हैं, तो कई नाम उनके रूपों और अवतारों से जुड़ा हुआ है।
इनमें से ही एक नाम है- नीलकंठ, जो उनके नीले गले से जुड़ा है। यह नाम महान त्याग और करुणा की कथा सुनाता है, जो समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा हुआ है।
भगवान शिव “नीलकंठ” कैसे बने?

विष्णु पुराण के अनुसार, जब महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्री हीन (धन, वैभव और ऐश्वर्य) हो गया। तब सभी देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन का उपाय बताया और कहा कि इसमें से अमृत निकलेगा। जिसे ग्रहण करने के बाद सभी देवता अमर हो जाएंगे।
समुद्र मंथन के लिए एक विशाल मथानी और मथनी की आवश्यकता थी। देवताओं और असुरों ने मंदराचल पर्वत को मथानी के रूप में चुना, जो अत्यंत विशाल और मजबूत था, लेकिन मंदराचल पर्वत को उठाना असंभव था।
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तब भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लिया और समुद्र के तल पर जाकर पर्वत को अपनी पीठ पर टिका लिया। वासुकी नाग को नेती (मथनी) बनया गया, देवताओं ने वासुकि की पूंछ की ओर से पकड़ा, जबकि असुरों ने फन की ओर से और समुद्र-मंथन शुरू हुआ।
जैसे-जैसे मंदराचल घूमता गया, समुद्र की लहरें उछलने लगीं और सबसे पहले कालकूट विष निकला, यह विष इतना भयंकर था कि इसकी ज्वालाएं आकाश को छू रही थीं, तेज़ गंध से जीव मर रहे थे, तीनों लोकों में भय व्याप्त हो गया।
देव-असुर सभी भयभीत हो गए। इस हलाहल विष को कहीं भी फेंका नहीं जा सकता था, क्योंकि यह पूरी सृष्टि को ही नष्ट कर देता। श्री-ब्रह्मा और श्री-हरी विष्णु ने भी इससे संभालने से इनकार कर दिया। तब सभी देवों और असुरों ने महादेव शिव की शरण लेने के लिए उनकी प्रार्थना की।
शिव कैलाश पर ध्नयानस्थ थे। सभी की पुकार सुनकर वह प्रकट हुए और भगवान शिव ने संसार के कल्याण के लिए कालकूट नामक हलाहल विष को पीकर अपने कंठ में उसे धारण किया। जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया, तभी से महादेव को “नीलकंठ” के नाम से जाना जाने लगा, जहां “नील” का अर्थ नीला और “कंठ” का अर्थ गला है।
सभी देवताओं और असुरों ने शिव की स्तुति की, विष पान की वजह से भोलेनाथ को अत्यधिक गर्मी लगने लगी। इससे बेचैन होकर वह शीतलता की खोज में हिमालय की तरफ बढ़ चले। मणिकूट पर्वत पर पंकजा और मधुमती नदी के संगम पर एक वृक्ष के नीचे वर्षों तक समाधि लगाकर बैठे रहे।
देवी-देवताओं ने शिवजी को शीतलता देने के लिए उनका जल से अभिषेक किया। इसके बाद उन्होंने अपनी आंखें खोली और पुनः अपने कैलाश पर चले गए।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी हिंदू धर्म के मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है, जो विभिन्न माध्यमों (ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों) से संग्रहित कर आप तक पहुंचाई गई हैं। जो केवल सूचनार्थ हैं, पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख में निहित जानकारी अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें, अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)





